म्यूचुअल फंड में Portfolio Rebalancing का मतलब है –
अपने निवेश (Investment) को फिर से संतुलित करना, ताकि आपका पैसा उसी अनुपात में बना रहे जैसा आपने शुरुआत में तय किया था।
यानी अगर किसी एक जगह पैसा ज़्यादा बढ़ गया और दूसरी जगह कम हो गया, तो थोड़ा बेचकर और थोड़ा खरीदकर उसे वापस संतुलित कर दिया जाता है।
आसान उदाहरण से समझिए
मान लीजिए आपने कुल ₹1,00,000 निवेश किया और तय किया कि:
- 60% Equity Mutual Fund में
- 40% Debt Mutual Fund में
तो शुरुआत में आपका पोर्टफोलियो ऐसा होगा:
- Equity = ₹60,000
- Debt = ₹40,000
1 साल बाद क्या हुआ?
मान लीजिए Equity बहुत अच्छा बढ़ गया और Debt कम बढ़ा।
अब आपका पैसा हो गया:
- Equity = ₹80,000
- Debt = ₹45,000
कुल = ₹1,25,000
अब प्रतिशत देखिए:
- Equity ≈ 64%
- Debt ≈ 36%
लेकिन आपने तो 60 : 40 का लक्ष्य रखा था।
अब क्या करेंगे? (यही Rebalancing है)
आपको करना होगा:
- Equity से थोड़ा पैसा निकालना (sell)
- Debt में थोड़ा पैसा डालना (buy)
ताकि फिर से पोर्टफोलियो हो जाए:
- Equity ≈ 60%
- Debt ≈ 40%
इस प्रक्रिया को ही Portfolio Rebalancing कहते हैं।
और भी आसान भाषा में
Portfolio Rebalancing का मतलब है:
जो बहुत ज्यादा बढ़ गया है उसे थोड़ा कम करना और जो कम है उसमें थोड़ा बढ़ाना।
Rebalancing क्यों जरूरी है?
- Risk Control – Equity ज्यादा हो जाए तो जोखिम बढ़ जाता है।
- लक्ष्य बनाए रखना – आपका असली Asset Allocation बना रहता है।
- Profit Booking – जो बहुत बढ़ा है उसमें से थोड़ा लाभ लॉक कर लेते हैं।
Rebalancing कब करनी चाहिए?
आमतौर पर लोग:
- हर 6 महीने
- हर 1 साल
- या जब Allocation 5–10% बदल जाए
तब Rebalance करते हैं।
छोटा सा नियम याद रखें
High पर थोड़ा बेचो, Low पर थोड़ा खरीदो = Portfolio Rebalancing


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